Saturday, 29 August 2015

पुराने दोस्त...

चलो कुछ  के,
दरवाज़े खटखटाते हैं !
देखते हैं उनके पँख थक चुके है,
या अभी भी फड़फड़ाते हैं !
हँसते हैं खिलखिलाकर,
या होंठ बंद कर मुस्कुराते हैं !
वो बता देतें हैं सारी आपबीती,
या सिर्फ सफलताएं सुनाते हैं !
हमारा चेहरा देख वो,
अपनेपन से मुस्कुराते हैं !
या घड़ी की और देखकर,
हमें जाने का वक़्त बताते हैं !
चलो कुछ पुराने दोस्तों के,
दरवाज़े खटखटाते हैं !

Tuesday, 14 April 2015

जिन्दगी अपनी ..

किताब लेकर...
रोज मैं ढूँढता हूँ जवाब.....
जिंदगी है क़ि रोज...
'सिलेबस' के बाहर से ही पूछती है..