Wednesday, 14 October 2015

कितनी बड़ी दिखती होंगी..

कितनी बड़ी दिखती होंगी मक्खी को चीजें छोटी
सागर सा प्याला भर जल पर्वत सी एक कौर रोटी।
खिला फूल गुलदस्ते जैसा कांटा भारी भाला सा
तालों का सूराख उसे होगा बैरगिया नालासा।
हरे भरे मैदानों की तरह होगा इक पीपल का पात
पेड़ों के समूहसा होगा बचा खुचा थाली का भात।
ओस बूंद दरपनसी होगी सरसो होगी बेल समान
सांस मनुज की आंधीसी करती होगी उसको हैरान

Thursday, 8 October 2015

बचपन..

छीनकर खिलौनो को बाँट दिये गम
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम...

अच्छी तरह से अभी पढ़ना न आया
कपड़ों को अपने बदलना न आया
लाद दिए बस्ते हैं भारी-भरकम
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम...

अँग्रेजी शब्दों का पढ़ना-पढ़ाना
घर आके दिया हुआ काम निबटाना
होमवर्क करने में फूल जाये दम
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम...

देकर के थपकी न माँ मुझे सुलाती
दादी है अब नहीं कहानियाँ सुनाती
बिलख रही कैद बनी, जीवन सरगम
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम...

इतने कठिन विषय कि छूटे पसीना
रात-दिन किताबों को घोट-घोट पीना
उस पर भी नम्बर आते हैं बहुत कम
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम...